मर रहा है माउंट आबू: आखिर इस लिमड़ी कोठी का मालिक कौन है? जिससे सरकारी अफसर इतने डरे हुए हैं

माउंट आबू की लिमड़ी कोठी में निर्माण चल रहा है, जबकि अनुमति रिपेयरिंग की मिली थी। इस निर्माण को रुकवाने के लिए जिम्मेदार अफसरों की आंखों में खौफ है या रिश्वत की चाह। यह जनता भली—भांति जानती है।

आखिर इस लिमड़ी कोठी का मालिक कौन है? जिससे सरकारी अफसर इतने डरे हुए हैं

माउंट आबू | राजस्थान की ग्रीष्मकालीन राजधानी में आम आदमी को अपनी टपकती छत रिपेयर कराने की अनुमति नहीं है। परन्तु बड़े सफेदपोश नेताओं की एक होटल आसमान चूम रही है। नियम विरुद्ध बजरी सप्लाई धड़ल्ले से जारी है और सरकार तमाम शिकायतों के बावजूद खामोश है।

माउंट आबू की लिमड़ी कोठी में निर्माण चल रहा है, जबकि अनुमति रिपेयरिंग की मिली थी। इस निर्माण को रुकवाने के लिए जिम्मेदार अफसरों की आंखों में खौफ है या रिश्वत की चाह। यह जनता भली—भांति जानती है।

माउंट आबू के ईको सेंसिटिव जोन में सत्ता के लोग पर्यावरण कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। रियासतकालीन लिमड़ी कोठी की दूसरी मंज़िल की छत टीन शेड (लोहे के पतरे) से बनी हुई थी। परन्तु खबर में वर्णित फोटोज में आप देख सकते हैं कि किस तरह से आरसीसी का निर्माण किया जा रहा है।

तमाम कायदों में इस तरह के बदलाव नहीं करने का जिक्र होने के बावजूद सरकारी अफसरों की शह पर यह धतकर्म लगातार जारी है। आम आदमी और यहां के आदिवासी टपकती छतों पर एक मुट्ठी सीमेंट और बदहाल जर्जर मकानों में एक ईंट लगाने को तरस रहे हैं। परन्तु रसूखदारों की कोठियां आसमानी निर्माण पा रही है।

मजे की बात तो यह है कि लिमड़ी कोठी का आका कौन है, जिससे प्रदेश की सरकार पूरी तरह से डरी हुई है। कुछ लोग साफ कह रहे हैं कि यह सरकार के ही किसी बड़े नेता का निर्माण है। परन्तु उन्होंने अपने कृपा पात्र एक नेता के नाम से यह काम किया है। 

उपखण्ड प्रशासन को नियम विरुद्ध हुआ यह कार्य कहीं नज़र ही नहीं आ रहा। इस मामले में फर्स्ट भारत ने सबसे पहले मुद्दा उठाया तो जिला प्रशासन के आदेश पर एसडीएम ने जांच की। इस जांच रिपोर्ट में आबू एसडीएम ने कहा कि कोई नया निर्माण नहीं हुआ है। यह तो लाल बहादुर शास्त्री प्रशा​सनिक अकादमी में पढ़कर आए कलक्टर की योग्यता पर ही सवाल है कि जब आरोप ही उपखण्ड कार्यालय पर है तो वह अफसर सही जांच करेगा ही क्यों? आप तस्वीरों में 2008 और 2021 की लिमड़ी कोठी में फर्क भी देख सकते हैं। साफ देख सकते हैं।

जिस भवन में नही रहता कोई उसे मरम्मत की परमिशन, लेकिन जिस घर में पीढ़ियों से रह रहे लोग, वो मरम्मत की परमिशन के लिए वर्षों से खा रहे ठोकरें
आपको बता दें लिमडी कोठी पिछले कई दशकों से वीरान पड़ी थी। इस भवन में कभी कोई व्यक्ति स्थाई नही रहता था। इस कोठी का थोड़े वर्षों पूर्व बेचान किया गया और एक बड़े राजनेता ने इसका स्वामित्व अपने अधीन लिया।

प्रदेश में सत्ताधारी दल से जुड़ा होने के कारण इस कोठी में किसी का स्थाई निवास नही होने के बावजूद इस कोठी के रिपेयरिंग की उपखण्ड प्रशासन ने रातों रात में स्वीकृत जारी कर दी। जबकि जिन घरों में लोग पीढ़ियों से रह रहे हैं और उनके घर जीर्णशीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं वे लोग पिछले 15 से 20 वर्षों से अपने आशियाने की मरम्मत की परमिशन मांग रहे लेकिन ईको सेंसिटिव जोन के चलते उन्हें परमिशन नही मिल रही हैं, और उनकी फाइलें दबी की दबी पड़ी हैं।

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वहीं लिमडी कोठी की रिपेयरिंग की परमिशन किस व्यक्ति के नाम से जारी की, इसका असली मालिक कौन हैं? ये भी जानकारी उपखण्ड प्रशासन के पास नही होने के बावजूद परमिशन जारी कर दी गई, जो सवालों के घेरे में हैं।

लिमडी कोठी के आसपास के क्षेत्र को कंस्ट्रक्शन फ्री जोन में शामिल करने की रणनीति
माउंट आबू में उक्त लिमडी कोठी जिस जगह स्थित हैं वो क्षेत्र नक्की झील से अर्बुदा देवी सर्किल जाने वाली सड़क के पश्चिमी भाग में स्थित हैं। और जोनल मास्टर प्लान 2030 में उक्त भाग "नो कंस्ट्रक्शन जोन" के रूप में अंकित हैं।

इस भूभाग पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य नही किया जा सकता। लेकिन राज्य सरकार इस भूभाग को "नो कंस्ट्रक्शन जोन से कंस्ट्रक्शन जोन" में तब्दील करने के लिए माउंट आबू नगरपालिका से प्रस्ताव पारित करवा रही हैं। और नगरपालिका ने ऐसा कर भी दिया हैं। अब आप इसे सत्ता का दुरुपयोग नही तो क्या कहेंगे?

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