Cow Lover: एक अधिकारी का ऐसा गौ प्रेम, सरकारी आवास की दीवारों पर भी लीपवा दिया गोबर

- अब तक पांच राज्यों में 152 कथाओं के माध्यम से करीब 19 करोड़ का गौ-ग्रास किया एकत्रित - राकेश पुरोहित का पूरा परिवार वर्ष 2012 से गौ-व्रती - गौ माता के बीच रहकर ही खाली समय बिताते हैं राकेश पुरोहित

एक अधिकारी का ऐसा गौ प्रेम, सरकारी आवास की दीवारों पर भी लीपवा दिया गोबर
Rakesh Purohit

गौरव अग्रवाल-

सिरोही | किसी अधिकारी के मन मे शायद ही आपने ऐसा गौ-प्रेम देखा होगा जो अपने सरकारी आवास की दीवारों पर भी गोबर से लीप दे। ऐसा गौ-प्रेम हैं सिरोही जिले के पिंडवाड़ा तहसील के आदर्श गांव निवासी राकेश पुरोहित में जो वर्तमान में चित्तौड़ जिला परिषद में एसीईओ के पद पर कार्यरत हैं। एसीईओ राकेश पुरोहित अब तक पांच राज्यों में 152 निशुल्क गौ-कथाएं कर चुके हैं।इन कथाओं के माध्यम से उन्होंने अब तक 19 करोड़ रुपये का गौ-ग्रास गौशालाओं की गायों को उपलब्ध करवाया हैं।राकेश पुरोहित की इसी गौ-भक्ति से अब तक 56 गौशालाएं पुनर्जीवित हो चुकी हैं।

राकेश पुरोहित से जुड़ी जानकारी

राकेश पुरोहित का जन्म 23 जून 1980 निर्जला एकादशी के दिन हुआ था।राकेश पुरोहित ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने पैतृक गांव आदर्श में ही ग्रहण की उसके बाद कक्षा 11 वीं व 12 वीं की पढ़ाई उन्होंने सरुपगंज कस्बे से की।इसके बाद उन्होंने सिरोही कॉलेज में पढ़ाई की और बाद में जयपुर और दिल्ली में अपनी पढ़ाई पूरी की।वर्ष 2006 की शिक्षक भर्ती में उन्होंने परीक्षा दी और वर्ष 2008 में उनका बतौर शिक्षक चयन हो गया।इस दौरान उन्होंने सिरोही में एक कोचिंग संस्था जो कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए खोला था जिसका नाम सृजन था।शुरुआत में करीब 42 महीने तक वो सरकारी अध्यपक के तौर पर छात्रों को पढ़ाते रहे साथ ही उन्होंने आरएएस की तैयारी जारी रखी और आरएएस भर्ती में उन्होंने परीक्षा दी वर्ष 2011 में उनका चयन हो गया।पहली पोस्टिंग उन्हें जालोर जिले के जसवंतपुरा में बतौर बीडीओ के रूप में हुई।उसके बाद वो भीनमाल,आमेट में भी बीडीओ के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।वर्तमान में राकेश पुरोहित चित्तौड़ जिला परिषद में अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।चित्तौड़ जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पद रिक्त होने से वो मुख्य कार्यकारी अधिकारी का भी अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे हैं।

यहां से जागा गौ-माता के प्रति प्रेम और शुरू हुई गौभक्ति

दरअसल राकेश पुरोहित की पहली पोस्टिंग जालोर जिले के जसवंतपुरा बीडीओ के पद पर हुई थी।इस दौरान राकेश पुरोहित का अचानक ही नंदगांव गौशाला जाना हुआ फिर क्या था राकेश पुरोहित को ऐसी गौ-भक्ति चढ़ी की वो वहीं के होकर रह गए।राकेश पुरोहित जब पहली बार नंदगांव गौशाला गए और उसके बाद जब वो अपने कार्यभूमि जसवंतपुरा वापस आए तो उनके मन में विचार आया कि अब उन्हें नंदगांव में ही रुकना है और रोजाना वहीं से ही जसवंतपुरा जो कि उनका कार्यस्थल था वहां आना हैं।उसके बाद राकेश पुरोहित अपने सारा सामान लेकर नंदगांव गौशाला चले गए और रोजाना वहीं से ही जसवंतपुरा आया करते।इस दौरान राकेश पुरोहित ने एक हजार राते नंदगांव गौशाला में ही बिताई और गौ-सेवा में लीन हो गए।वो रोजाना सुबह दो घण्टे तक गायों का गोबर उठाते,परिक्रमा करते और शाम को ग्वालों को संकीर्तन करवाते थे।

यहां से हुई गौ-कथा की शुरुआत

राकेश पुरोहित जब भीनमाल में बीडीओ के पद पर कार्यरत थे तब एक दिन वो गार्डन में वॉक कर रहे थे इस दौरान उनके मन में विचार आया कि दिनभर तो काम में निकल जाता हैं लेकिन रोजाना सिर्फ सोकर 12 घण्टे निकालने से अच्छा हैं कि इन रातों का भी सदुपयोग किया जाए।ऐसे में उन्होंने अपनी पहली गौ-कथा 2017 में भीनमाल के पास के गांव भादडा में की।उनके मन में दूसरी कथा का कोई विचार भी नही था लेकिन जब पहली कथा चल रही थी उसी दौरान कथा में मौजूद एक श्रावक ने घोषणा की अगली कथा मेरे गांव में की जाए।उसके बाद तो कथाओं का दौर लगातार जारी रहा।राकेश पुरोहित बताते हैं कि उस समय गांवो में गायों के प्रति इतनी चेतना नही थी ऐसे में गांवो में चेतना जगाने के लिए विशेष रूप से गांवो में गौ-कथाएं की गई।उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में करीब 50 से ज्यादा कथाएं तो ट्रैक्टर-ट्रॉली को स्टेज में रूप में इस्तेमाल कर की गई।जिस गांव में कथा करने जाते थे वहां का जल तक ग्रहण नही करते थे।गौ-कथाएं पूर्ण रूप से निशुल्क किया करते थे और वहां से जितना भी गौ-ग्रास मिलता वो स्थानीय या फिर जरूरतमंद गौशालाओं में दिया जाता था।

एक समूह जिसका नाम मां तेरा-तुझको अर्पण

भीनमाल में बतौर बीडीओ राकेश पुरोहित ने अपना एक समूह बनाया जिसका नाम मां तेरा तुझको अर्पण हैं।इस समूह ने भीनमाल की स्थानीय गोपाल-कृष्ण गौशाला को बीमार पशुओं के लिए एक एम्बुलेंस भेंट की थी।आज भीनमाल की गोपाल कृष्णा गौशाला में करीब 1200 गौ-माताएं हैं और तीन एम्बुलेंस हैं।अभी चार माह पहले जब गोपाल-कृष्णा गौशाला की आर्थिक स्थिति ठीक नही थी तब राकेश पुरोहित से गौशाला प्रबंधन ने बात की थी तो उस वक़्त राकेश पुरोहित आमेट में बीडीओ थे।जैसे ही राकेश पुरोहित को इस बात की जानकारी मिली उन्होंने गौशाला की आर्थिक मदद के लिए गौ-कथा की और कथा के दौरान एक रात में ही करीब एक करोड़ 62 लाख का गौग्रास  एकत्रित किया गया।राजसमंद जिले के सिंघाना गौशाला जिसे मेवाड़ का गौरव कहा जाता हैं।राकेश पुरोहित जब पहली बार उस गौशाला में गए थे उस वक़्त उस गौशाला में 300 गौमाता थी लेकिन आज उस गौशाला का कायाकल्प हो चुका हैं।1200 गौमाता के साथ वहां पर सीसीटीवी कैमरे से लेकर तीन एम्बुलेंस व कूलर पंखे भी गौमाता के लिए लगे हुए है।मां तेरा तुझको अर्पण समूह में करीब आठ से दस हजार युवा कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं।

राजकीय आवास के एक कक्ष को गोबर से लीपकर करते हैं तैयार

एसीईओ राकेश पुरोहित जहां भी पोस्टेड होते हैं वहां मिले सरकारी आवास के एक कक्ष को गोबर से लीपवा देते हैं।वो बताते हैं कि गौ मूत्र,गोबर,गंगाजल और कपूर का मिश्रण कर दीवारों पर लीपा जाता हैं ताकि किसी भी प्रकार की कोई भी नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नही हो सके।इसी गोबर से लीपे कक्ष में ही राकेश पुरोहित जप-तप पूजा पाठ किया करते हैं।राकेश पुरोहित के अनोखे रूप से तैयार सरकारी आवास से हर कोई रोमांचित हो उठता हैं।

आरएएस इंटरव्यू के दौरान एक रोचक किस्सा

दरअसल राकेश पुरोहित का जब आरएएस का इंटरव्यू था तब उनकी भाषा-शैली को देखकर इंटरव्यू लेने वाले अधिकारियों ने उनके शब्द चयन समेत भाषा-शैली को देखकर कहा कि आपको प्रशासक नही बल्कि संत बनना हैं। राकेश पुरोहित को प्रशासनिक संत और आध्यात्मिक जगत में हरे कृष्णा नाम से जाना जाता हैं।राकेश पुरोहित का पूरा परिवार वर्ष 2012 से गौ व्रती हैं। हम गौमाता के दूध, घी के अलावा बाजार की किसी भी चीज को नही खाते हैं।

अपने कार्यालय में भी गौमाता की तस्वीर

राकेश पुरोहित जहां भी सेवारत रहते हैं वहां सरकारी कार्यालय में गौमाता की तस्वीर जरूर लगाते हैं।ऐसे में जो भी लोग उनके चेम्बर में आते हैं वो तस्वीर और उनकी सादगी से जरूर प्रभावित होते हैं।राकेश पुरोहित कहते हैं आने वाले को गौ माता के दर्शन होते है तो उनको भी सात्विक विचार आते हैं। परिसर में गौ माता व कृष्णा भक्ति के पोस्टर से दर्शन के अलावा कर्मचारियों को भी ईमानदारी से कार्य करने की सीख मिलती हैं।

नंदगांव से पहले इस्कॉन का भी रहा प्रभाव

राकेश पुरोहित अपने छात्र जीवन में इस्कॉन से भी जुड़े रहे।वर्ष 2000 से वर्ष 2005 तक वो इस्कॉन से जुड़े रहे।इस दौरान करीब दो साल तक तो वो लगातार हर शनिवार को इस्कॉन जाते थे और शनिवार-रविवार को वहीं रुकते थे और वहां पर भागवत कथा का पाठ समेत भजन कीर्तन करते थे।ऐसे में राकेश पुरोहित के मन में शुरू से ही आध्यात्मिक भाव रहा हैं।बचपन में भी उनके नानाजी ने उन्हें गीता जी प्रदान की थी जिसे वे नियमित रूप से पढ़ा करते थे।

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