गणगौर महोत्सव....: बैंड-बाजो के साथ निकली ईसर-गवर की सवारी, आकर्षक परिधानों में सजी महिलाएं-बालिकाएं, सवारी देखने उमड़े कस्बेवासी

सरुपगंज कस्बे में अग्रवाल महिला मंडल की ओर से गणगौर महोत्सव मनाया गया।इस दौरान बैंड बाजों के साथ रथ में ईसर-गवर की शोभायात्रा निकाली गई।ईसर-गवर की शाही सवारी को देखने के लिए पूरा कस्बा उमड़ पड़ा।आकर्षक परिधानों में सजी महिलाएं तीजणियां बनकर चल रही थी।

बैंड-बाजो के साथ निकली ईसर-गवर की सवारी, आकर्षक परिधानों में सजी महिलाएं-बालिकाएं, सवारी देखने उमड़े कस्बेवासी

गौरव अग्रवाल, फर्स्ट भारत . सरुपगंज | भारत में मनाए जाने वाले कई त्योहार में से एक गणगौर महोत्सव भी काफी प्रसिद्ध हैं।खास तौर पर राजस्थान में गणगौर व्रत बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं।गणगौर में 'गण' भगवान भोलेनाथ और 'गौर' शब्द माता पार्वती के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं।यह व्रत पत्नियां अपने पति की लंबी आयु के लिए वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर प्राप्ति के लिए रखती हैं।

सरुपगंज कस्बे में अग्रवाल महिला मंडल की ओर से गणगौर महोत्सव मनाया गया।इस दौरान बैंड बाजों के साथ रथ में ईसर-गवर की शोभायात्रा निकाली गई।ईसर-गवर की शाही सवारी को देखने के लिए पूरा कस्बा उमड़ पड़ा।आकर्षक परिधानों में सजी महिलाएं तीजणियां बनकर चल रही थी।

सरुपगंज कस्बे के लक्ष्मीनारायण मंदिर से शुरू हुई शोभायात्रा मुख्य बाजार,झंडा गली,पुराना बस स्टैंड रोड, सुभाष सर्किल होते हुए रामेश्वर मंदिर पहुंची जहां विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की गई।शोभायात्रा में महिला मंडल अध्यक्ष संगीता बंसल,शीतल बंसल,राधा मित्तल,आयुषी अग्रवाल, ललिता अग्रवाल,पूजा अग्रवाल,नीमा अग्रवाल,ममता बंसल,संगीता मंगल,रीना अग्रवाल,ममता अग्रवाल समेत काफी संख्या में महिलाएं मौजूद रही।

धुलंडी के साथ शुरू होता हैं गणगौर महोत्सव-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार धुलंडी से लेकर चैत्र शुक्ल की तीज तक गणगौर महोत्सव मनाया जाता हैं।गणगौर महोत्सव 16 दिनों तक मनाया जाता हैं।
इस त्योहार के प्रति महिलाओं व बालिकाओं में काफी उत्साह रहता हैं।महिलाएं गवर के मंगल गीत गाती हैं हुई सुख शांति की कामना करती हैं।पत्नियां जहां अपने पति की लंबी आयु के लिए तो कुंवारी कन्याएं इच्छित वर की कामना करती हैं।

क्या हैं गणगौर व्रत के पीछे की कहानी-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार जब पार्वती मां ने भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप और साधना के साथ व्रत रखा था तब भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता पार्वती को दर्शन दिए थे।माता पार्वती के समक्ष प्रकट होकर भगवान शिव ने उनसे वर मांगने को कहा तब माता पार्वती ने भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में मांग लिया।

उसके बाद माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह हो गया साथ ही भगवान शिव ने माता पार्वती को अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान भी दिया।

भगवान शिव से मिले इस वरदान को माता पार्वती ने अपने तक ही सीमित नही रखा बल्कि उन्होंने कहा कि यह वरदान उन सभी महिलाओं के लिए भी हैं जो इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा पूरे विधि विधान से कर रही थी।बस उसी समय से गणगौर व्रत सभी जगह प्रसिद्ध हो गया और आज सभी कुंवारी कन्याएं तथा महिलाएं इसे बड़ी श्रद्धा और प्रेम से करती हैं।

गणगौर महोत्सव में 16 दिनों से पूज रही थी 9 नवविवाहिताएं

सरुपगंज कस्बे में पिछले 16 दिनों से गणगौर पूजन किया जा रहा हैं।नवविवाहिताओं व कुंवारी बालिकाओ ने माता का पूजन कर उन्हें घर में तैयार किए पकवानों का भोग लगाया।उन्हें सुहाग की वस्तुएं अर्पित की गई।नवविवाहिताओं ने सुहाग की लंबी आयु की कामना की साथ ही कुंवारी कन्याओं ने इच्छित वर की कामना की।कस्बे की नवविवाहिताएंप्रियंका,निधि, ट्विंकल,गरीमा, नेहा,शिवानी,पूजा,श्वेता व कोमल ने गणगौर पूजन किया।

इस तरह करते हैं व्रत

गणगौर व्रत के दिन कुंवारी कन्याएं और महिलाएं सुबह सोलह श्रृंगार करके बाग-बगीची से हरी दूब और पानी और फूल मिला हुआ पानी लोटो में भरकर उन्हें अपने सिर पर रखकर गीत गाती हुई घर लेकर आती हैं।इसके बाद लकड़ी के पाटे पर कपड़ा बिछाकर उस पर ईसर और गवर की मिट्टी से बनी हुई प्रतिमा स्थापित की जाती हैं।ईसर और गवर को रंग बिरंगे वस्त्र पहनाकर काजल,रोली,मेहंदी आदि से गणगौर के गीत गाते हुए पूजन किया जाता हैं।

इसके बाद दीवार पर मेहंदी,काजल और रोली की 16-16 बिंदिया महिलाओं व 8-8 बिंदिया कुंवारी कन्याओं द्वारा लगाई गई साथ ही एक खाली थाली में पानी,दूध,दही,हल्दी और कुमकुम घोलकर सुहागजल तैयार किया जाता हैं उसके बाद दोनों हाथों में हरी दूब लेकर इस जल से पहले गणगौर को छींटे लगाकर और बाद में महिलाएं अपने ऊपर छींटे मारती हैं।

इन छींटों को सुहाग का प्रतीक माना जाता हैं।पूजा के अंत मे गणगौर माता की कहानी सुनी जाती हैं।इसके बाद शाम के समय में ईसर-गवर को पानी पिलाकर रामेश्वर मंदिर के पवित्र कुंड में विसर्जित किया जाता हैं।

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