एम्स के बीच एक करार पर हस्ताक्षर: 'सिकल सेल डिजीज' की जांच में जिला अस्पताल का सहयोग करेगा एम्स  

- अनुवांशिक बीमारी है सिकल सेल डिजीज, नवजात शिशु के रक्त की जांच करेगा एम्स - जिला अस्पताल एवं एम्स के बीच आज हुए एमओयू पर हस्ताक्षर, भविष्य में एम्स जिला अस्पताल में ही जांच के लिए लगाएगा उपकरण

'सिकल सेल डिजीज' की जांच में जिला अस्पताल का सहयोग करेगा एम्स  

शिवगंज | राजस्थान के सिरोही सहित उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा, प्रतापगढ जैसे ट्रायबल जिलों में अनुवांशिक तौर पर फैली सिकल सेल डिजीज जो आगे चलकर लकवा, ऑक्सीजन की कमी,गुर्दे की बीमारी सहित अन्य बीमारियों का कारण बनती है,की रोकथाम के लिए अब जिला अस्पताल को अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान एम्स सहयोग करेगा।

भारत सरकार के जनजातीय मामलों का मंत्रालय एवं राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की ओर से सिकल सेल डिजीज की रोकथाम को लेकर जारी निर्देशों की पालना में सिरोही जिले में भी एम्स ने जिला अस्पतालों में इस बीमारी की जांच के लिए तैयारी की है। इसके तहत मंगलवार को जिला अस्पताल शिवगंज और एम्स के बीच एक करार पर हस्ताक्षर किए गए है। जिसमें अस्पताल में जन्म लेने वाले नवजात के रक्त की जांच का नमूना एम्स में भेजा जाकर इसकी जांच की जाएगी कि नवजात इस बीमारी से ग्रसित है या नहीं। यदि कोई नवजात इससे ग्रसित पाया जाता है तो एम्स की देखरेख में उसका उपचार किया जाएगा। ताकि इस अनुवांशिक बीमारी को रोका जा सके। भविष्य में एम्स जिला अस्पताल में ही इसकी जांच के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवाएगा।

मंगलवार को जिला अस्पताल के पीएमओ कार्यालय में अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान एम्स जोधपुर से आए डॉ अभिषेक पुरोहित, डॉ सियाराम डिडेल व डॉ दौलतसिंह शेखावत और जिला अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डॉ अखिलेश पुरोहित ने इस करार पर हस्ताक्षर किए। एम्स के चिकित्सक डॉ अभिषेक पुरोहित व सियाराम डिडेल ने इस बीमारी के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सिकल सेल डिजीज जो एक अनुवांशिक बीमारी है, जो एक तरह से हिमोज्लोबिन से संबंधित बीमारी है। यह बीमारी मरीज ऑक्सीजन की कमी, लकवा होना, गुर्दे खराब होना, हड्डियां कमजोर होने जैसी अन्य बीमारियों का कारण बनती है। उन्होंने बताया कि इसके लक्षण पहचान कर इसका उपचार किया जा सकता है तथा इसकी वजह से होने वाली इस तरह की बीमारियों से बचाव किया जा सकता है।

एम्स के दल ने बताया कि एम्स के डीन प्रोफेसर कुलदीपसिंह जो शिशु रोग विभाग के विभागाध्यक्ष है के निर्देशन में जिला अस्पताल में जन्म लेने वाले नवजात के रक्त की जांच की जाएगी। फिलवक्त अस्पताल से रक्त के नमूने लेकर एम्स में भेजे जाएंगे। वहां जांच के बाद यदि जांच पोजिटीव आती है तो उसका एम्स की देखरेख में उपचार किया जाएगा। दल के सदस्यों ने बताया कि बाद में जिला अस्पताल में ही इसकी स्क्रिनिंग की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने बताया कि यह जांच एक साधारण जांच है जिसमें नवजात के एक से दो बूंद रक्त से ही इस बीमारी की स्क्रिनिंग हो सकेगी। दल के सदस्यों ने बताया कि यह एक छिपी हुई बीमारी है जो आगे चलकर कई बीमारियों का कारण बनती है। इसका पता भी तब चलता है जब कोई बच्चा अत्यधिक बीमार हो जाता है। उन्होंने बताया कि इस बीमारी में रक्त कणिकाएं एक हंसिया जिसे स्थानीय भाषा में घास काटने की दांताळी होती है उसकी तरह होता है,जो मरीज की नसों को ब्लॉक कर देता है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी प्रदेश के सिरोही सहित डूंगरपुर, बांसवाडा, उदयपुर, बांसवाडा जैसे आदिवासी बेल्ट में अधिक फैली हुई है।

एम्स व जिला अस्पताल के बीच इस बीमारी की रोकथाम के लिए करार होने के बाद एम्स के दल ने जिला अस्पताल का अवलोकन भी किया।

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