कोरोना ने बदला शादी का रिवाज: कोरोना के चलते कंधों पर उठाकर निकाली दूल्हे की बिंदोली

कोरोनाकाल ने ग्रामीण अंचल में ही नहीं बल्कि शहरी इलाकों में सामाजिक रीति-रिवाजों के मायने बदल गए। महामारी के बीच वैवाहिक आयोजनों की अनिवार्यता में एहतियात ने नए तरीकों को जन्म दिया है। जब बिंदोली और गणेश पूजा के लिए परिजन दूल्हे को घोड़ी पर ले जाने की बजाए कंधे पर बिठाकर निकले।

कोरोना के चलते कंधों पर उठाकर निकाली दूल्हे की बिंदोली

सिरोही।
कोरोनाकाल ने ग्रामीण अंचल में ही नहीं बल्कि शहरी इलाकों में सामाजिक रीति-रिवाजों के मायने बदल गए। महामारी के बीच वैवाहिक आयोजनों की अनिवार्यता में एहतियात ने नए तरीकों को जन्म दिया है। इसकी एक बानगी मंगलवार रात को शहर में देखने को मिली, जब बिंदोली और गणेश पूजा के लिए परिजन दूल्हे को घोड़ी पर ले जाने की बजाए कंधे पर बिठाकर निकले। परिवार के मजबूत कंधे वाले व्यक्तियों ने बारी-बारी से दूल्हे को ऊपर बिठाया और उस ओर बढ़ते गए जहां दुल्हन हाथ में वरमाला लेकर इंतजार कर रही थी। इस तरह की अनूठी और नई रस्म बांसवाड़ा और दाहोद मुख्य मार्ग पर आगन्तुक लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रही। खास यह भी देखने में आया कि दूल्हे के साथ परिजनों की संख्या सीमित होने के अलावा हर व्यक्ति मास्क पहने हुए दिखाई दिया। इससे दूल्हे खुद भी अछूता नहीं दिखा। दरअसल, शादी विवाह में दूल्हे की तैयारी के साथ घोड़ी की अनिवार्यतता भी बढ़ जाती है। ऐसे में बिंदोली पर घोड़ी मुख्य तौर पर आकर्षण होती है, लेकिन बांसवाड़ा के बाहुबली निवासी प्रवीण की शादी को लेकर घोड़ी नसीब नहीं हुई। सरकारी प्रतिबंध के बीच कोई घोड़ी वाला दूल्हे के लिए घोड़ी देने को राजी नहीं हुआ। यह देख परिजनों नीयत समय में विवाह की रस्म पूरी करने की ठानी और घोड़ी के अभाव में दूल्हे को कंधे में बिठाकर आयोजन पूरा किया। इस दौरान परिजनों ने दूल्हे का उत्साह बनाए रखने की हरसंभव कोशिश की। प्रवीण के ही नजदीकी मनीष ने बताया कि दूल्हा भीड़ में हटके दिखना चाहिए। इसलिए परिजनों ने सामूहिक सलाह करते हुए उसे कंधे पर बिठाकर नाचने-गाने का निर्णय लिया। बैंड की व्यवस्था नहीं होती देख परिजनों ने केवल ढोल से रस्म रिवाज पूरे किए।