हलक सूखे तो याद आई पाइपलाइन: सत्रह साल पहले बिछाई पाइप लाइन बिखरी, अब सर्वे करवा खर्च का करवा रहे आकलन

वर्ष 2003 में आपातकालीन स्थिति के दौरान जोधपुर के कुड़ी हौद से रोहट तक करीब 40 किलोमीटर लम्बी 500 एमएम की पाइप लाइन बिछाई गई थी। यह पाइप उस समय करीब 30 साल पुराने थे।

सत्रह साल पहले बिछाई पाइप लाइन बिखरी, अब सर्वे करवा खर्च का करवा रहे आकलन

रोहित पारीक
पाली। पश्चिमी राजस्थान के सबसे बड़े जवाईबांध के तल दिखाने की वजह से जिले के दस कस्बों तथा छह सौ से अधिक गांवों की प्यास बुझाने की चिंता जलदाय विभाग को सताने लग गई है। इस चिंता के बीच जलदाय विभाग ने वर्ष 2003 में आपातकालीन स्थिति के दौरान जोधपुर के कुड़ी से पाली जिले के रोहट तक करीब 40 किलोमीटर लम्बी बिछाई गई 500 एमएम की पाइप लाइन की थाह लेना शुरू कर दिया है। जलदाय विभाग इस पाइपलाइन की वर्तमान हालत को लेकर सर्वे करवा रहा है। सर्वे में इस पाइपलाइन को दोबारा तैयार करवाकर इस पर आने वाले खर्च का आकलन किया जाएगा।
देखरेख के अभाव में वर्तमान में इस पाइप लाइन की हालत ऐसी नहीं हैं कि इसके जरिए कुड़ी से रोहट तक पानी पहुंचाया जा सके। वर्ष 2003 में आपातकालीन स्थिति के दौरान जोधपुर के कुड़ी हौद से रोहट तक करीब 40 किलोमीटर लम्बी 500 एमएम की पाइप लाइन बिछाई गई थी। यह पाइप उस समय करीब 30 साल पुराने थे। पाइप लाइन बिछाने के बाद समय पर सार-संभाल नहीं करने से वर्तमान में पेयजल पाइप लाइन की हालत खस्ता हो चुकी हैं। जगह-जगह पाइप लीकेज हैं तो कई जगह पाइप का आपस में कनेक्शन ही टूट गया हैं। 
जलदाय विभाग के एसई नीरज माथुर का कहना हैं कि पाइप लाइन को दुरुस्त करवाने को लेकर सर्वे की कार्रवाई चल रही हैं। इसके बाद जल्द ही इसे दुरुस्त करवाया जाएगा। सोमवार को जिले के प्रमुख पेयजलस्रोत जवाई बांध में 12.20 फीट ही बचा। जो धीरे-धीरे कम हो रहा हैं। जल्द ही जवाई बांध क्षेत्र में बरसात नहीं हुई तो जिलेवासियों को एक बार फिर बड़े पेयजल संकट से रूबरू होना पड़ेगा।
किसानों की हो रही हालत खराब
पश्चिमी राजस्थान में वर्षा-आधारित बारानी (असिंचित) कृषि 11.17 मिलियन हेक्टेयर यानी कुल भौगोलिक क्षेत्र के 53.49 प्रतिशत हिस्से में होती है। इस बार मानसून पश्चिमी राजस्थान से रूठा हुआ है, जिससे किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अब तो पशुओं के लिए चारे का संकट भी खड़ा होने लगा है। जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर में 41.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में से 30.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर खरीफ फसलों की बुआई हुई, जो कि करीब 75 फीसदी है। इसमें से केवल 11 लाख हेक्टेयर फसलें बची हैं, बाकी सब नष्ट हो चुकी है।
जालोर जिले में 60 फीसदी फसलों को नुकसान
जालोर जिले में खरीफ बुआई का लक्ष्य 6 लाख 18 हजार हेक्टेयर का था, लेकिन इस साल 4 लाख 13 हजार 429 हेक्टेयर में बुआई हुई है। अधिकांश फसलें जल चुकी हैं। यहां ज्वार और बाजरा की 3 लाख 36 हजार हेक्टेयर पर बुआई होती है, जो इस बार केवल 2 लाख 52 हजार 125 हेक्टेयर पर हुई। फसलें 50 प्रतिशत जल चुकी हैं। मूंग, मोठ की दलहन की फसल 11 लाख 50 हजार हेक्टेयर पर होती है, लेकिन इस बार बुआई 87 हजार 973 हेक्टेयर पर ही हुई। तिल, मूंगफली, अरंडी को मिलाकर कुल तिलहन फसलों की बुआई 1 लाख 11 हजार हेक्टेयर पर होती है, लेकिन इस बार 41 हजार 425 हेक्टेयर पर सिमट कर रह गई। जालोर जिले में कपास की 1 हजार हेक्टेयर में से 630 हेक्टेयर बुआई हुई। ग्वार सीड की भी 45 हजार में से 25 हजार हेक्टेयर में बुआई हो पाई है। यहां औसत बारिश 560 मिमी होती है, जो कि 124.33 मिमी ही अब तक दर्ज हुई है।

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