पीड़ित जीवों को नवजीवन: अपंग पशुधन को नया जीवन दे रहे हैं डॉ. तपेश माथुर, कृष्णा लिम्ब नाम से कृत्रिम अंगों के माध्यम से पीड़ित जीवों की मदद कर रहे हैं डॉ. और उनकी पत्नी क्षिप्रा

माथुर का यह प्रयास स्तुत्य है, इनकी पत्नी क्षिप्रा ने अध्यापन की नौकरी छोड़कर इस काम में हाथ बंटाना शुरू किया है। यह समर्पण लोगों के लिए प्रेरणादायी है और पीड़ित जीवों के लिए राहत पहुंचाने वाला भी। पशुमालिक तो लाभान्वित होते ही हैं, यह काम करके इनके मन में भी संतोष का अनुभव होता है।

अपंग पशुधन को नया जीवन दे रहे हैं डॉ. तपेश माथुर, कृष्णा लिम्ब नाम से कृत्रिम अंगों के माध्यम से पीड़ित जीवों की मदद कर रहे हैं डॉ. और उनकी पत्नी क्षिप्रा
Dr. Tapesh Mathur

जयपुर | अपंग हुए पशुधन का जीवन कितना कष्टप्रद होता है, हम अंदाजा नहीं लगा सकते। परन्तु इस दर्द को न केवल महसूस किया और इसका उपचार करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं जयपुर के चिकित्सक डॉ. तपेश माथुर ने।

2014 में डॉ. तपेश माथुर को जयपुर में हिंगोनिया गोशाला में तैनात किए गए। इन्हें प्लास्टिक का सेवन करने वाली गायों की सर्जरी का काम दिया गया। उस काम को शिद्दत से करते हुए डॉ. माथुर ने गाय पुनर्वास आश्रय में जानवरों की मौत के बढ़ते मामलों के बाद तैनात किया गया था। प्लास्टिक का सेवन करने वाली गायों की मदद के लिए पशु चिकित्सक दिन में कम से कम एक सर्जरी करेगा। उनके प्रयासों ने गायों की मृत्यु दर को कम करने में मदद की।

इसके साथ ही माथुर ने उन अपंग गायों के लिए कृत्रिम अंगों की आवश्यकता को महसूस किया जो हादसों में अपने अंग गंवाकर बदहाल जीवन जी रही थीं। डॉ. माथुर कहते हैं कि जानवर अंग विच्छेद के बाद जीवित तो रहते हैं, लेकिन जीवन पहले जैसा नहीं होता। परन्तु एक कृत्रिम अंग उनके जीवन आसान बनाता है और जीवनकाल को भी बढ़ाता है।

माथुर ने जल्द ही 'कृष्णा लिम्ब' ब्रांड के तहत अंग खो चुके जानवरों के लिए कृत्रिम अंग बनाना शुरू कर दिया, जिसका नाम पहले  बडछ़े कृष्णा के नाम पर रखा गया। उन्हें अब तक देश भर में 160 जानवरों के लिए कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए जा चुके हैं। डॉ. माथुर फिलहाल अपने घर ही से एक कार्यशाला चला रहे हैं। कोविड महामारी के दौरान भी माथुर ने परीस्थितियों से हार नहीं मानी और वीडियो कॉल के माध्यम से काम को जारी रखा। प्रोथेस्टिक्स से ठीक हुए जानवरों की देखभाल के लिए पशुमालिकों को गाइड किया और चिकित्सकों से भी प्रभावी रायशुमारी की।

बहुत है चुनौतियां
इस काम में चुनौतियां बहुत है। यह काम करने के लिए 16 राज्यों की यात्रा करने की जरूरत है। अंगों का माप लेने, लगाने और जानवरों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए तकनीशियनों की आवश्यकता है। वे कहते हैं कि प्रत्येक परियोजना पर यात्रा के अलावा समय का भी खर्च होता है। माथुर कहते हैं कि बहुत से लोग यह सोचकर उनसे संपर्क करते हैं कि कृत्रिम अंग एक स्थायी समाधान है जो उन्हें एक विकलांग जानवर की देखभाल की अतिरिक्त जिम्मेदारी से मुक्त कर देगा।

धैर्य और संवेदनशीलता की जरूरत

माथुर का कहना है कि कृत्रिम अंग का उपयोग करने में सक्षम होने के लिए पशु मालिक को धैर्यवान और संवेदनशील होने की जरूरत है। कृत्रिम अंग पर पशु के जीवन को प्रभावी करने के लिए समय और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, कृत्रिम अंग को सात से आठ घंटे के उपयोग के बाद हटा दिया जाना चाहिए, अगले दिन साफ ​​और परिष्कृत किया जाना चाहिए। पशु चिकित्सक अंततः इसके लिए जाने वालों से लिखित आश्वासन लेता है कि वे अपने जानवर की देखभाल करना जारी रखेंगे।

गायों के लिए किया है ज्यादा काम
डॉ. माथुर के काम से ज्यादातर गोवंश का जीवन बचा और प्रभावी हुआ है। उनका कहना है कि कई गौशालाओं में जानवरों की देखभाल के लिए समर्पण की कमी है। अच्छे अनुभव भी होते हैं, जैसे कि एक बछड़ा जिसके आगे के दोनों अंगों में प्रोस्थेटिक्स होता है, वह अच्छी तरह से चल रहा होता है। बीकानेर में, माथुर ने एक गाय पर एक कृत्रिम अंग लगाया और मालिक को उसे गोशाला से घर वापस ले जाने के लिए राजी किया। हैदराबाद और जैसलमेर में, कृत्रिम अंग प्राप्त करने वाली गर्भवती गायों ने स्वस्थ बछड़ों को जन्म दिया। 

सपत्नीक करते हैं काम
माथुर का यह प्रयास स्तुत्य है, इनकी पत्नी क्षिप्रा ने अध्यापन की नौकरी छोड़कर इस काम में हाथ बंटाना शुरू किया है। कई पशुमालिक अपने जानवरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए समय और श्रम का भुगतान करने को तैयार है, लेकिन कई बार यह संभव नहीं होता। जैसे घायल पक्षियों के लिए। डॉ. माथुर और उनकी पत्नी का यह समर्पण लोगों के लिए प्रेरणादायी है और पीड़ित जीवों के लिए राहत पहुंचाने वाला भी। पशुमालिक तो लाभान्वित होते ही हैं, यह काम करके इनके मन में भी संतोष का अनुभव होता है।

ऐसे हुई शुरूआत
कुछ साल पहले कृष्णा नाम का एक बछड़ा, जिसका एक्सीडेंट हो गया था, उसे डॉ. तपेश के पॉलीक्लिनिक में लाया गया था। जान बचाने के लिए उस मासूम जानवर का पैर काटना पड़ा। इस निरीह प्राणी को फिर से चलने में मदद करने के लिए उत्सुक डॉ. तपेश ने कृत्रिम अंग लगाने का फैसला किया। डॉ. तपेश कहते हैं "यह एक आसान प्रक्रिया नहीं है, जैसे यह मनुष्यों के लिए है। हम इंसान जानते हैं कि कृत्रिम अंग हमारे जीवन को बेहतर बनाने में मदद करेंगे। लेकिन जानवर यह नहीं जानते। वे सहज रूप से उनसे छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं। कृष्णा ने भी शुरू में ऐसा ही किया था। 15 दिनों की फिजियोथेरेपी के बाद, कृष्णा धीरे-धीरे अंग का आदि हो गया। उसके बाद कृष्णा चला नहीं, बल्कि दौड़ा। डॉ. तपेश कहते हैं कि मैं उस नजारे की खुशी को बयां नहीं कर सकता।

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