राजपूत समाज की पहल: गुड़ा केसर सिंह गांव के लोगों ने परम्पराओं को दिया विशिष्ट रूप, कुप्रथाओं में बदलती जा रही परम्पराओं में अनूठा सुधार

जो सामाजिक रीति रिवाज हमारे पूर्वजों के द्वारा जिन पवित्र उद्देश्यों के साथ यह बने थे। वे पवित्र भाव के चलते रहे, लेकिन समय के साथ उसमें दिखावे की होड़ के कारण फालतू खर्च बढ़ता गया। इससे समाज के हर घर परिवार को उस बोझ को अनावश्यक झेलना पड़ता है।

गुड़ा केसर सिंह गांव के लोगों ने परम्पराओं को दिया विशिष्ट रूप, कुप्रथाओं में बदलती जा रही परम्पराओं में अनूठा सुधार

पाली | पाली जिले के गुड़ा केसरसिंह गांव में राजपूत समाज के लोगों ने कुछ विशिष्ट परम्पराओं को मूर्त रूप देते हुए अनूठी पहल की है। यह पहल लोगों की प्रेरणा का स्रोत बन रही है और इसकी चहुंओर तारीफ हो रही है।

गुड़ा केसर सिंह गांव के दलपत सिंह राठौड़ के अनुसार गांव में होली स्नेह मिलन के साथ दिनांक 18 मार्च को धुलंडी के दिन सुबह 10:00 बजे रावली पोल में राजपूत समाज की एक बैठक रखी गई। इस बैठक में गांव के राठौड़, शेखावत और राणावत परिवार के सभी बड़े बुजुर्ग सम्मिलित हुए।  

बैठक में यह माना कि गांव में राजपूत समाज के सामाजिक रीति-रिवाजों में जो ऐसी कुरीतियां आ गई हैं, जिनसे हर परिवार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है। ऐसे मामलों में रीति रिवाज को बनाए रखते हुए आर्थिक बोझ की कुरीति को कैसे कम किया जाए? इस पर विचार विमर्श किया गया। इस गहन विचार-विमर्श के बाद सभी ने फैसला किया कि जिन विषयों पर बात हुई हैं, उन पर लिखित में दस्तावेज तैयार किया जाए और उपस्थित सभी जनों से हस्ताक्षर करवाए जाए। साथ ही इसको अखबार और युवा वर्ग सोशल मीडिया के माध्यम से भी प्रचारित करें ताकि दूसरे गांवों में भी इस बात का प्रचार हो।

सभी ने इस निर्णय पर हर्ष व्यक्त किया पहले सभी फैसले लिखकर पढ़कर बैठक में सुनाए गए तथा उन पर उपस्थित सभी लोगों ने आशापुरा माताजी के जयकारे के बाद हस्ताक्षर किए।  इसके बाद ही लोगों ने होली खेली। यही नहीं आने वाली दीपावली पर गांव में ऐसे ही एक महिला सम्मेलन और पूरे गांव के सहभोज के आयोजन रखने पर विचार भी किया गया ताकि और भी सुधारों पर मंथन कर और निर्णय लिए जा सके । साथ ही परिवार की महिलाओं के सुझावों को प्राप्त किया जा सके, जिन पर भी आगे निर्णय लिए जाएंगे।

फालतू खर्च में बदल गए रिवाज
बैठक में यह सामने आया कि जो सामाजिक रीति रिवाज हमारे पूर्वजों के द्वारा जिन पवित्र उद्देश्यों के साथ यह बने थे। वे पवित्र भाव के चलते रहे, लेकिन समय के साथ उसमें दिखावे की होड़ के कारण फालतू खर्च बढ़ता गया। इससे समाज के हर घर परिवार को उस बोझ को अनावश्यक झेलना पड़ता है। इसका समाज के किसी व्यक्ति को कोई लाभ नहीं है। इस पर यह तय किया  गया कि ऐसी कुरीतियों को खत्म किया जाए।

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परजोन पर किया निर्णय
बैठक में विवाह के अवसर पर बारात स्वागत के समय तोरण के ठीक पहले जो "परजोन" की रस्म होती है जिसमें दूल्हे का तिलक लगाकर और दुल्हन के परिजनों की तरफ से अंगूठी, चेन इत्यादि पहनाकर स्वागत किया जाता है। आजकल दिखावे की गलत परंपरा के चलते दूल्हे के साथ उसके पिताजी, उनके बहनोई और निकट संबंधियों को भी अंगूठियां पहनाने का रिवाज प्रचलन में आया है। इससे न केवल लड़की के परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है बल्कि इससे एक गलत दिखावा शुरू होता है जिसका कोई अंत नहीं है। दूल्हे के रिश्तेदार को दी गई एक अंगूठी से उनको इतना बड़ा कोई फायदा नहीं होता और ऐसी अनेक अंगूठियों का भार अनावश्यक रूप से दुल्हन के पिता को झेलना पड़ता है। इसलिए सभी ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि हमारे गुडा केसर सिंह गांव से जाने वाली बारात और गांव में आने वाली बारात के "परजॉन" पर दूल्हे के अलावा उनके किसी भी रिश्तेदार को चैन अंगूठी इत्यादि परजोन पर गिफ्ट नहीं किए जाएंगे । अगर कोई इस नियम को भंग करता है तो गांव वाले तुरंत परजोन से उठ कर घर चले जाएंगे और उसके शादी समारोह में शरीक नहीं होंगे।

तय की पड़ले के थाल की संख्या
दूसरा फैसला एक और रिवाज 'पड़ले के थाल' की संख्या पर किया गया । गांव में जो बारात आती हैं वे दुल्हन के घर कुछ सुहाग सामग्री के साथ भेंट थाल में सजाकर लेकर जाते हैं जिनकी संख्या मोटे तौर पर 11 होनी चाहिए लेकिन दिखावे की होड़ के कारण 101 की संख्या तक थाल मंगवाए जाते हैं जो अगले रिश्तेदार पर एक अनावश्यक खर्चे का भार होता है । इसलिए सर्वसम्मति से फैसला किया गया है कि अधिकतम 21 थाल ही मंगाए जा सकेंगे । यथासंभव केवल 11 थाल मंगवाए जाएं, लेकिन 21 से एक भी अधिक होने पर गांव वाले उस समारोह में शामिल नहीं होंगे। ऐसा ही नियम बारात लेकर जाने पर भी  माना जाएगा।

मौखाण पर परम्परा निर्वहन, अनावश्यक खर्च नहीं
इसी तरह जब किसी की मृत्यु होती है तो उसके बाद बारहवें पर जो सगे संबंधी आते हैं वह अपनी बहन बेटी और जंवाई के अलावा पूरे कुटुंब के रिश्तेदारों के कपड़े-  पोशाक, साफा इत्यादि लेकर आते हैं । इससे हर रिश्तेदार पर अनुपयोगी और अपशुकन के कपड़े घर में लाने का आर्थिक भार बढ़ता है। इसलिए गहन विचार के बाद इस रीति को जीवित रखते हुए और इसमें से जो अनावश्यक खर्चे का भार बढ़ाने वाली कुरीति जुड़ गई है उसको खत्म करने का निर्णय लिया गया और यह फैसला किया गया कि बारहवें पर गांव में आने वाले सगे संबंधी केवल अपनी बहन बेटी के लिए एक पोशाक और जंवाई के लिए केवल एक साफा लेकर आएंगे । कुटुंब के अन्य परिजनों के लिए किसी प्रकार का कपड़ा नहीं लाया जाएगा । साथ ही परिवार में आने वाली बहन बेटी के साथ भी महिला रिश्तेदार होते हैं उनको वापस कपड़े कराए जाते हैं जिसमें अनावश्यक विवाद होते हैं और  अनुपयोगी कपड़ों पर धन का अपव्यय होता है। इसको खत्म करने का फैसला लिया गया और केवल बहन बेटी को एक पोशाक कराई जाएगी । उनके साथ आने वाले महिला रिश्तेदारों को ना कपड़े कराए जाएंगे और ना ही कोई बर्तन या कोई अन्य वस्तु भेंट में दी जाएगी।  ऐसा ही गांव से अन्य रिश्तेदारी में जाने पर इस नियम का पालन किया जाएगा कि गांव की बहू के साथ जाने वाले परिवार की अन्य महिलाएं कोई पोशाक या बर्तन आदि भेंट सामने वाले रिश्तेदार से ग्रहण नहीं करेंगे। केवल उनके परिवार की बहन बेटी के लिए एक पोशाक स्वीकार की जाएगी।

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होती को लेकर यह किया निर्णय
इसी के साथ तीन और फैसले लिए गए जिसमें गांव में बहू के पीहर से आने वाली "होती" (मिठाई) केवल 3 बड़े शुभ अवसरों- शादी, 'जाया-आणा' और ढूंढोत्सव की खुशी के मौके की बांटी जाएगी। बाकी सब छोटी बड़ी सब 'होती-पोती' को बैठक की दिनांक से बंद करने का निर्णय लिया गया।

शादी में खेतलाजी पूजन के लिए करीब 40 किलो बाकळे बनाकर गांव में 'होती' बंटती थी। इसके स्थान पर केवल खेतलाजी के लिए सवा किलो बाकळा बनाकर रिवाज को स्वस्थ रुप से जीवित रखने का निर्णय लिया गया और अन्न तथा धन की बर्बादी को रोकने का फैसला किया गया। 

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बारहवें पर मंदिर में करेंगे राशि भेंट
इसी तरह बारहवें पर 'सुख-सेज' की सामग्री के बदले मंदिर पर रुपए 1100/- की भेंट की जाएगी।

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