Gangaur 2022  गणगौर की पारंपरिक शाही सवारी आखिर क्यों रखा जाता हैं गणगौर व्रत

  BY FIRST BHARAT

राजस्थान में गणगौर पूजा पर महिलाएं शिव और गौरी की कृपा पाने के पूजा और व्रत करती हैं। उत्तर भारत में ये त्यौहार खासा लोकप्रिय है। गणगौर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया पर मनाया जाता है।

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यह व्रत पत्नियां अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए और कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर प्राप्त करने के लिए रखती हैं। 

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इस पर्व को लगभग 16 दिनों तक लगातार मनाया जाता है और इसे महिलाओं के सामूहिक दल के रूप में मनाया जाता है। गणगौर की पूजा होली के दूसरे दिन से ही शुरू होती है और 16 दिनों तक लगातार चलती हैं।

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जयपुर में गणगौर की पारंपरिक शाही सवारी पूरे ठाट-बाट और लवाजमे के साथ शाही सवारी त्रिपोलिया गेट से शुरू होेेेेकर छोटी चौपड और गणगौरी बाजार होते हुए तालकटोरा तक जाती हैं।

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इस दौरान पारम्परिक नृत्य और कई तरह की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र होती हैं। जिनमें कच्ची घोड़ी, कालबेलिया, बहरूपिया, अलगोजा, गैर, चकरी शामिल हैं। जुलूस में तोप गाड़ी, सुसज्जित रथ, घोड़े और ऊंट भी शामिल होते हैं। 

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एक बार जब पार्वती मां ने भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप और साधना के साथ व्रत रखा था। तब भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता पार्वती को दर्शन दिए।

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माता पार्वती के समक्ष प्रकट होकर भगवान शिव ने उनसे वर मांगने को कहा। तब माता पार्वती ने वरदान में भगवान शिव को ही अपने पति के रुप में मांग लिया। उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हो गया। 

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भगवान शिव ने माता पार्वती को अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान भी दिया। यह वरदान उन सभी महिलाओं के लिए भी है जो इस दिन मां पार्वती और भगवान शंकर की पूजा पूरे विधि-विधान से कर रही थीं।

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 तभी से गणगौर व्रत सभी जगह प्रसिद्ध हो गया और आज सभी कुंवारी कन्याएं तथा महिलाएं इसे बड़ी श्रद्धा और प्रेम से करती हैं।

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